बिहारी लाल का जीवन परिचय Bihari Lal Biography in Hindi

बिहारी लाल का जीवन परिचय Bihari Lal Biography in Hindi


नाम - बिहारी लाल 

जन्म - सन् 1559 

जन्म स्थान - वसुआ गोविन्दपुर

मृत्य - सन् 1663

मृत्यु स्थान - वृंदावन

पिता का नाम - केशवराय

माता का नाम - कोई साक्ष्य - प्रमाण प्राप्त नहीं है। 

गुरु - स्वामी नरहरिदास

भाषा - हिन्दी, बुंदेलखंडी, उर्दू, फारसी

कृतियाँ - बिहारी सतसई 

 जीवन परिचय:-

बिहारी लाल रीतिकाल के प्रसिध्द कवि हैं। इनका बचपन बुंदेलखंड में बिता,यौवन ससुराल में व्यतीत हुआ।इनकी ससुराल मथुरा में थी।ये जयपुर के मिर्जा राजा जयसिंह (महाराज जयपुर) के दरबार में रहा करते थे। तथा ब्रजभाषा के रीतिकालीन कवियों में उल्लेखनीय महाकवि बिहारी मुक्त काव्यों की विशाल साहित्य परम्परा के अन्तिम कवि हैं। 

माता-पिता:-

बिहारीलाल के पिता का नाम केशव राय था तथा माता के सम्बन्ध में कोई साक्ष्य - प्रमाण प्राप्त नहीं है। 

 जन्म:-

कवि बिहारीला के जन्म के सम्बन्ध में नलिन विलोचन शर्मा और केसरी कुमार की धारण है कि इनका जन्म संवत् 1652 में हुआ था।


शिक्षा:-

बिहारी जब सात-आठ साल के थे, तो इनके पिता ग्वालियर छोड़कर ओरछा आ गये थे। बिहारी लाल जी ने यही सुप्रसिध्द कवि केशव दास से दर्शन किये। हलाँकि बिहारी के पिता केशव राय भी एक अच्छे कवि थे, पर वे ही केशव दास नहीं थे, जिनकी एक प्रसिध्द साहित्यकार की तरह मान्यता है। केशवदास ओरछा नरेश के यहाँ से जाने के बाद कवि बिहारी के पिताजी ने भी ओरछा को छोड़कर मधुरा की ओर प्रस्थान किया।

भाषा:-

रीति काल के प्रसिध्द कवि बिहारी लाल की भाषा साहित्यक ब्रजभाषा है, जिसमें उर्दू, फारसी, पूर्वी हिंदी, बूंदेलखंडी आदि भाषा भी सम्मिलित हैं। 

विवाह:-

बिहारा लाल जी का विवाह मधुरा के किसी बाह्मण की कन्या के साथ हुआ था। 

संतान:-

कहाँ जाता है की कवि बिहारा लाल जी के कोई संतान ना होने के कारण इन्होंने अपने भतीजे निरंजन को गोद लिया था।निरंजन का पूरा नाम निरंजन कृष्ण था। 

गुरु:-

कवि बिहारा लाल जी काव्य-गुरु आचार्य नरहरीदास जी थे।कहा जाता है कि महात्मा नरहरीदास के मुँह से बिहारी की प्रशंसा सुनकर शाहजहाँ ने बिहारी को आगरे में बुलाकर सम्मनित किया। यहीं बिहारी की भेंट अब्दुलरहीम खानखाना से हुई। एक बार शाहजहाँ के दरबार में बहुत देशों के नरेश आये थे। बिहारी ने अपनी कविताएं सुनाई जिससे सभी नरेश अत्यधिक प्रभावित हुए और सबने बिहारी को वार्षिक पुरस्कार देने का वादा किया।इसी वार्षिक पुरस्कार के सिलसिले में बिहारी राजा जयसिंह के दरबार में पहुँचे थे। 

रचना:-

सतसई उनकी एकमात्र रचना है, जिसमें कुल 713 दोहे संकलित हैं। बिहारी सतसई श्रृंगार रस की सुप्रसिध्द और अनुपम रचना है।"सतसई"शब्द "सात" और "सई" से बना है जिसमें सत का अर्थ सात और सई का अर्थ "सो" है। जिसमें संग्रहित दोहों में उनके उपरोक्त सभी प्रकार के दोहे हैं। ये दोहे कल्पना की समाहार शक्ति और भाषा की समास-शक्ति के कारण न केवल अपने प्रभाव के लिए महत्व रखते हैं बल्कि उनकी अद्भुत कवित्व-प्रतिभा के लिए परिचायक हैं। 

मृत्यु:-

कवि बिहारी लाल की मृत्यु 1663 को वृन्दावन में हुई थी। अपनी पत्नी के मृत्यु के बाद बिहारी लाल वृन्दावन चले गए। और वही उन्होंने अपनी शरीर का त्याग किया। 

बिहारी लाल जी के काव्य:- 

  • पावस रितु वृंदावन की
  • खेलत फाग दुहूँ तिय कौ
  • बौरसरी मधुपान छक्यौ
  • जाके लिए घर आई घिघाय
  • है यह आजु वसन्त समौ
  • नील पर कटि तट
  • जानत नहिं लागि में
  • वंस बड़ौ बड़ी संगतिं पाई
  • रतनारी हो थारी आँखड़िया
  • बिरहानल दाह दहे तन ताप
  • सौंह कियें ढरकौहे से नैन
  • केसरि से बरन सुबरन
  • गागि सरोवर सौरभ लै
  • हौ झालौ दे रसिया नागर पनाॅ
  • उड़ि गुलाल घूँघर भई  
  • मैं अपनौ मनभावन लीनों
  • माही सरोवर सौरभ लै

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1 Comments

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