सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला का जीवन परिचय Suryakant Tripathi Nirala ka Jivan Parichay

सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला का जीवन परिचय Suryakant Tripathi Nirala ka Jivan Parichay


नाम-सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

उप नाम-निराला

जन्म-21 फरवरी 1899

जन्म स्थान-महिषादल, जिला मेदनीपुर (पश्चिम बंगाल) 

आयु-62 वर्ष 

पिता-पंडित रामसहाय 

माता-ज्ञात नहीं

पत्नी-मनोहरा देवी

बच्चे-एक पुत्री 

मृत्यु-15 अक्टुबर 1961


जीवन परिचय:-
सूरीकांत त्रिपाठी 'निराला' का जन्म सन् 21 फरवरी 1899 ई० की बसंत पंचमी को मेदनीपुर बंगाल में हुआ। 

पिता:-
उनके पिता पं० राम सहाय त्रिपाठी उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के गढ़कोला गाँव के निवासी थे परंतु स्टेट में नौकरी होने से वे वहीं मेदनीपुर (महिषादल) में बस जए। तीन वर्ष की आयु में ही निराला जी की माँ की मृत्यु हो गयी। उनके पिता ने दूसरी शादी न कर अपने इकलौते बेटे के पालन-पोषण पर अधिक ध्यान दिया। 

विवाह:-
पन्द्रह वर्ष की अवस्था में उनका विहाह मनोहरा देवी से हो गयी जो एक पुत्री को जन्म देकर बीस बरस की अवस्था में इफ्लुएंजा का शिकार होने के कारण चल बसी। चार भतीजों और एक पुत्री का बोझ उठाना पड़ा।एक तो मानसिक व्यथा और दूसरी गृहस्थी के बोझ ने इन्हें काफी कष्ट पहुँचायें परन्तु वह अपने कर्त्तव्य पथ से विचलित न और न ही दूसरी शादी ही इन्होंने की। 

शिक्षा:-
'निराला' जी की स्कूल की शिक्षा नवीं कक्षा तक ही प्राप्त हीई पर संस्कृति और बंगाल का अध्ययन इन्होंने घर पर ही किया। ये ब्रजभाषा के भी अच्छे जानकार थे और अपनी प्रखर प्रतिभा के बल पर उन्होंने खड़ी बोली का अच्छा ज्ञान प्राप्त किया। उनकी प्रारम्भिक रचनाओं को तो पत्र-पत्रिकाओं ने तो प्रकाशित ही नहीं किया और 'जूही की काली जैसी प्रसिध्द रचनाएं भी पत्र-सम्दाकों ने वापस कर दी। इस तरह इन्हें कवि के रूप में आने में काफी समय लगा। 

निष्कर्ष:-
निरालाजी छायावादी कवि हैं। उन्होंने मुक्त छन्दों में दार्शनिक छायावादी 'विराटसत्ता' और 'शाश्वत ज्योति' के रूप में व्यक्त किया है। कई जगहों पर वह इसे अमर विराम भाता श्यामा आदि पदों में व्यक्त करते हैं। इनके द्वारा वे उसी 'शाश्वत ज्योति'  की व्यंजना करते हैं। उनकी दृष्टि में कभी एक शाश्वत ज्योति है, जो उनकी कविता और उनके दार्शनिक सामाजिक और क्लात्मक विचारों के मूल में है। 

सूर्यकान्त त्रिपाठी की भाषा शैली:-
निरालाजी के भाषा शैली के चार रूप मिलते हैं' दीर्घ समास प्रधान-भाषा सरल, व्यावहारिक भाषा, सुबोध और सौष्ठव-प्रधान भाषा और अलंकृत कोमल भाषा। उपरोक्त विवेचनों के आधार पर हम कह सकते हैं कि निरालाजी के काव्य भाषा के अनेक रूप एक साथ मिल जाते हैं। भाव के प्रवाह में बहकर निरालाजी भाषा के गठन का ध्यान भूल जाते हैं। उनके वयंग्य काव्य की भाषा कहीं-कहीं तीखापन आर उदात्त रुप मिलता है। इनके आध्यात्मिक और प्रार्थनापरक कविताओं में भाषा का मधुर और प्रौढ़ रूप मिलता है। संपेक्ष में कहा जा सकता है कि निरालाजी की भाषा में कोमलता और माधुर्य के स्थान पर ओज और पौरुषता की प्रधानता है। सन् 1923 में निराला जी ने 'मतवाला' का सम्पादन किया और इसी बीच उन्होंने निराला उपनाम से काव्य रचना भी प्रारम्भ की। 'निराला' जी का सम्पूर्ण जीवन कष्टप्रद ही था। बीस वर्ष की होते-होते उनकी पुत्री सरोज ने भी इहलोक का परित्याग कर दिया, जिसका वियोग उन्हें अत्यन्त कष्टप्रद प्रतित हुआ और इसी वियोग में उन्होंने 'सरोज-स्मृति' नामक कविता लिख डाली। वह स्वभाव से सनशील और मिलनसार तथा उदार थे और उन्हें जो कुछ भी मिलता था वह दूसरों को दे डालते थे। जीवन के अंतिम काल में वह इलाहाबाद में रहें जो कुछ भी मिलता था वह दूसरों को दे डालते थे। जीवन के अंतिम काल में वह इलाहाबाद में रहें और यहीं 15 अक्टुबर 1961 को स्वर्गवासी हो गये। 

सूर्यकान्त त्रिपाठी की कृत्तियाँ:-
निराला जी बहुमुखी प्रतिभा के व्यक्ति थे। उन्होंने कविता के साथ-साथ कहानी उपन्यास, रेखाचित्र, आलोचना और निबन्ध आदि साहित्य को भी अपनाया। उनकी कृत्तियाँ इस प्रकार हैं:-

सूर्यकान्त त्रिपाठी का काव्य:-परिमाल, गीतिका, तुलसीदास, अनामिका, कुकुरमुत्ता, अणिमा, बेला, नये-पत्ते, अपरा, अर्चना, आराधना। 

सूर्यकान्त त्रिपाठी का कहानी संग्रह:-लिली, सखी, सुकुल की बीबी, चतुरी चमार। 

सूर्यकान्त त्रिपाठी के उपन्यास:-अप्सरा, अलका, प्रभावती, निरुपमा, उच्श्रृंखलता, छोटी की पकड़, काले-कारनामें, चमेली। 

सूर्यकान्त त्रिपाठी का रेखाचित्र:-कुल्ली भाट, बिल्लेसुर करिहा। 

सूर्यकान्त त्रिपाठी का आलोचना और निबन्ध:-प्रबन्ध पद्य, प्रबन्ध-प्रतिभा, प्रबन्ध-परिचय, रविंद्र कविता-कावन, चाबुक, पंत और पल्लव। 

सूर्यकान्त त्रिपाठी का जीवन-साहित्य:-राजा प्रताप, प्रह्लाद, ध्रुव, शकुन्तला आदि। 

अनुवाद:-महाभारत, श्रीरामकृष्ण वचनामृत, परिव्राजक स्वामी विवेकानन्द के भाषण, विवेकानन्द जी के संग में, देवी चौधरी, आनन्दमठ, चन्द्र शेखर, कृष्णकान्त झा वसीयतनामा दुर्गेशनन्दिनी, रजनी, युगलांगुयीय, राधारानी, तुलसीकृत रामचरितमानस की टिका, वात्सायन कृत कामसूत्र, हिंदी बंगला शिक्षा, गोविंदपु पदावली निरालाजी के काव्य के विकास के मूल में भावना की अपेक्षा बुध्दि तत्त्व की प्रमुखता रही। उनकी कुछ कविताओं में तो बौद्दिक उत्कर्ष अपनी पराकाष्ठा को पहुँचा हुआ मिलता है। परंतु इनमें ऐसी ओजस्विता है, जो स्त्काव्य की प्रतिष्ठा करती है और हृदय पर व्यापक प्रभाव छोड़ती है। 

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